क्या जीतेंगे इनसे जब सब गवा बैठे

क्या जीतेंगे इनसे जब सब गवा बैठे
समाज के ठेकेदारो को ही अपना दुश्मन बना बैठे
जब इन्होने ज़िंदगी को फिल्म बना डाली
और निज़ी जिंदगी को सार्वजनिक कर डाली
कैसे लोगो से उलझ कर बैठ गये
जितना असंभव था लेकिन फिर भी लड़ बैठे
निर्दयी लोग धर्म के मूल भूल गये
पूरे परिवार की ज़िंदगी निचोड़ गये
सबको दुश्मन बना डाला
जीवन् मे जहर घोल डाला
जब अपने ही हो गये थे पराए तो
कैसे इनसे उम्मीद रखे
बस अब तो भगवान की राख रखे

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